होर्मुज संकट कम होने से कच्चा तेल सस्ता होने के संकेत, भारतीय कंपनियों को राहत
मुंबई। वैश्विक ऊर्जा बाजार से भारत के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर आ रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास भू-राजनीतिक तनाव कम होने से कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति से जुड़ी वैश्विक चिंताएं अब लगभग पूरी तरह खत्म हो गई हैं। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब द्वारा अपने तेल निर्यात को दोबारा सामान्य दरों पर बढ़ाने से वैश्विक बाजार में क्रूड की कीमतों में गिरावट और ज्यादा गहरी हो गई है। चीन की तरफ से मांग कमजोर होने और बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ने से अब 'सप्लाई सरप्लस' (मांग से अधिक आपूर्ति) की स्थिति बन रही है, जिससे आने वाले दिनों में कच्चे तेल के दामों में और बड़ी गिरावट की उम्मीद है।
मशहूर वैश्विक वित्तीय सेवा प्रदाता 'सिटीग्रुप' ने अपनी होल्डिंग रिपोर्ट में कहा है कि भू-राजनीतिक तनाव में आई कमी के चलते ब्रेंट क्रूड ने संघर्ष के दौरान हुई अपनी सारी बढ़त गंवा दी है और इसमें ऊपरी स्तरों से करीब 30 फीसदी की गिरावट देखी जा चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि हालात इसी तरह सामान्य रहे, तो ब्रेंट क्रूड के दाम इस साल के अंत तक गिरकर 60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ सकते हैं।
इस अंतरराष्ट्रीय राहत से भारत की सरकारी तेल कंपनियों को अपने पिछले घाटे की भरपाई करने में बड़ी मदद मिलेगी, जिन्हें जून तिमाही तक करीब 74,781 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा था। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि कच्चे तेल के दाम इसी तरह कम रहे, तो सरकार आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती कर बड़ी राहत देने पर गंभीरता से विचार कर सकती है।
खाड़ी देशों से निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर के 90% तक पहुंचा
तेल बाजार की इस बड़ी गिरावट के पीछे खाड़ी देशों से होने वाली निर्बाध आपूर्ति है। सऊदी अरब पिछले हफ्ते के अंत में अपने विशाल 'रास तनुरा टर्मिनल' से शिपमेंट को दोबारा शुरू करने के बाद, अपने पुराने स्तर के करीब 90 फीसदी पर कच्चे तेल को लोड करने में कामयाब रहा है। सऊदी अरब की यह वापसी उसके पड़ोसी देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसी ही है, जिसने पिछले महीने अपने तेल निर्यात को युद्ध-पूर्व स्तर यानी 39 लाख बैरल प्रतिदिन से भी अधिक पर बहाल कर दिया था।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि होर्मुज के रास्ते अब कच्चे तेल की आपूर्ति एक करोड़ बैरल प्रतिदिन से अधिक हो गई है। इसके चलते बाजार में तेल की एक तरह से बाढ़ आ गई है, वह भी ऐसे समय में जब युद्ध के दौरान अपनाए गए कई वैकल्पिक और लंबे समुद्री रूट अब भी लागू हैं। दिग्गज ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने भी हाल के हफ्तों में कच्चे तेल के मूल्य के अपने अनुमानों में दो बार कटौती की है और आने वाले समय में सप्लाई सरप्लस को लेकर बाजार को सचेत किया है।
ऊर्जा बाजार में धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं हालात
होर्मुज के समुद्री मार्ग से जहाजों का आवागमन पूरी तरह सुचारू होने के साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजार अब धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है। इससे निकट अवधि में कच्चे तेल की उपलब्धता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। यह वैश्विक रिफाइनरियों के लिए एक बहुत बड़ी राहत है, जिन्हें संघर्ष के दिनों में महंगे और वैकल्पिक स्रोतों से तेल सुरक्षित करने के लिए भारी आपाधापी का सामना करना पड़ रहा था। तेल की कीमतें घटने से भारत जैसे बड़े आयातक देश के राजकोषीय घाटे में कमी आएगी और मुद्रास्फीति (महंगाई) को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी।
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