पचौली की खेती से किसानों की आय बढ़ाने की नई पहल
रायपुर : पचौली की सुगंधित खेती किसानों की आय बढ़ाने का एक आधुनिक और बेहद लाभदायक जरिया बन रही है। पचौली की खेती की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि एक बार पौधे खेत में तैयार हो जाने के बाद, उन्हीं पुराने पौधों से आगे के लिए नए पौधे आसानी से तैयार किए जा सकते हैं, इससे किसानों को बार-बार महंगे बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और खेती की कुल उत्पादन लागत काफी हद तक कम हो जाती है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें नई संभावनाओं से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी दिशा में छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड (वन विभाग) ने एक नई पहल शुरू की है। राज्य में पचौली की खेती का प्रायोगिक प्रोजेक्ट 8 एकड़ भूमि में शुरू किया गया है। इसके अच्छे परिणाम मिलने पर किसानों को बड़े स्तर पर इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
पचौली क्यों है लाभदायक
पचौली की खेती में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद का उपयोग करना अधिक लाभदायक साबित होता है। वे फसलों की सेहत सुधारने के लिए मुख्य रूप से गोबर, गोमूत्र और गुड़ से तैयार प्राकृतिक 'जीवामृत' का उपयोग करती हैं। पचौली एक सुगंधित और औषधीय पौधा है। इसकी पत्तियों से निकलने वाले तेल की देश और विदेश में अच्छी मांग है। इसका उपयोग इत्र, परफ्यूम, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, अरोमाथेरेपी और प्राकृतिक कीट-रोधक उत्पादों में किया जाता है। इसकी बढ़ती मांग किसानों के लिए बेहतर आय का अवसर बन रही है। प्रति एकड़ लगभग 30 किलो तेल उत्पादन और 6,000 रुपये प्रति लीटर तक के बाजार भाव के साथ, किसान पहले साल ही सभी खर्चे निकालकर 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं।
कम लागत, अधिक मुनाफा
पचौली की खेती में लागत अपेक्षाकृत कम आती है और मुनाफा अच्छा मिलता है। एक वर्ष में 2 से 3 बार कटाई की जा सकती है। इससे प्रति एकड़ लगभग 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक की शुद्ध आय प्राप्त होने की संभावना है। इसकी खेती खुले खेतों के साथ-साथ फलदार बगीचों, नारियल और सुपारी के बगीचों के बीच खाली जगह में भी की जा सकती है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है।
खेती की आसान तकनीक
पचौली की खेती गर्म और आर्द्र जलवायु में अच्छी होती है। जुलाई-अगस्त इसकी रोपाई का सबसे उपयुक्त समय है। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकों से इसकी पैदावार और गुणवत्ता दोनों बेहतर होती हैं। रोपाई के 4 से 6 महीने बाद पहली कटाई की जाती है और पत्तियों से भाप आसवन (स्टीम डिस्टिलेशन) विधि से तेल निकाला जाता है।
समूह में खेती से मिलेगा बड़ा लाभ
यदि किसान 30 से 40 एकड़ के क्लस्टर में पचौली की खेती करते हैं, तो बड़ी कंपनियां सीधे खेतों से उपज खरीदने के लिए आगे आती हैं। इससे किसानों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलने में सुविधा होती है। औषधि पादप बोर्ड किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और विपणन सहायता भी उपलब्ध करा रहा है।
किसानों के लिए नई उम्मीद
पचौली की खेती केवल एक नई फसल नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का नया अवसर है। यह पहल पारंपरिक खेती के साथ-साथ उच्च मूल्य वाली औषधीय और सुगंधित फसलों की ओर किसानों को प्रेरित कर रही है।
छत्तीसगढ़ सरकार और औषधि पादप बोर्ड का यह प्रयास किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने, खेती में विविधता लाने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पचौली की खुशबू अब छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए समृद्धि और आत्मनिर्भरता की नई पहचान बन रही है।
भोपाल में 40 पासपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, एयरपोर्ट और सीपोर्ट पर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट
प्रसूता को नहीं मिली एंबुलेंस, दर्द से कराहती महिला को पिकअप से अस्पताल ले गए परिजन
Gen-Z से राहुल गांधी का पुराना कनेक्शन, पांच साल पहले इंदौर में शो के जरिए की थी बातचीत
बॉलीवुड में नई जोड़ी का कमाल! मोहित सूरी और रामू लेकर आ रहे हैं रोमांटिक गैंगस्टर ड्रामा
गोविंदा संग अफेयर की खबरों पर नीलम कोठारी का बड़ा खुलासा, बोलीं- मेरे माता-पिता…